प्रादा
सरहदों में बटा
असमा तो नहीं
फिर लकीरों में क्यूं
उलची है जमीन
सरहदों में बटा
आसमा तो नहीं
फिर लकीरों में क्यूं उलची है जमीन
फर जो भी हो अब है ये किस्सा
इस
जमीन का है ये एहम हिस्सा
सारी दुनियां से ओं बसूरत है
कुछ करे ऐसा
अब जरूरत है
बात देते हम चब कोई शहे थे ता कि ये दुनिया रश्घ से कहते
हैつा स्वरोथ का है एसी वो पोता है
इन इसा में धील से कुछ पोता不能 Savastra
गोलीयों की जगे
खूखेंगी कोयले
देहन में बंबही फूटेंगी कोपले
सिंदगी
की तरह
धडकनों में पले
दिल की तहजीब में फिर से हम धले
रत आचल में लोरिया ताके
नर्म पल्कों से हर सुभाँ छांके
रिश्मी होगे भूब के धागे