तन्हा तन्हा लम्हों में कोई
पीती बातों को लेके खोई
माना मन ने मुंड ले अब तो मुझसे
आई आई बरसात आई यादों की वो कागज भिगोई
बरसात है आसो भिगा कागज मेरा मन
धीमी सी चलनी लगी धडड़कने दिल की
ठंडी सी घुलनी लगी आग उस घम की
धड़द में जीजी के धड़द से रो रो के परच्छाई से चप के चलने लगी आज मैं
उँज़ उँज़ उँज़ उँज़ उँज़
हूँ...
हूँ...
सपनों में कहीं मिल न चाए सोई नहीं
रासते टकरा नचाए सोची यही ये क्या हुआ
इस प्यार में जीके मरना ही जीना लगे
फिर क्या हुआ निकली कही दोर फिसली मनजल पे धड़द में जीजी के धड़द
से रो रो के परच्छाई से चप के चलने लगी आज मैं
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