उन्हों एक एसी लहर है वो
छूकर के किनारे को
चलती है मचलती है
खो जाती है सागर में
और एक किनारे सागर में
बेचेन में रहता हूँ छोड़ जाती है जाने क्यों यूँ ही दडबने को
मेरा ये पागल मन
दूढ़ने उसे पाने को
हर लम मुहाँ फिजाओं में वो
हसती है बहिकती है
कोई जाने न जाने क्यों
तनहाई तरसती है
हर लम मुहाँ
फिजाओं में वो
हसती है बहिकती है
मैं बस में
रहूं कैसे
अब
उससे कहूं कैसे
लगती है
अरुशक हो वो कोई परी जैसे
खुद को भुला करके बस एक दूआ करके
उस और बढ़ाऊं कदम और फिर यूँ ही जाओं थम
भीगी सी चांदनी वो मुझ पर यूँ भिखरती है
कोई जाने न जाने क्यों तनहाई तरसती है
रातों के अंधेरों में
बन के परचाईं वो
संग मेरे चलती है उम्मीदे भरती है
जन जान सी राहों में
लेकर उसे बाहों में जूम में बहकता हूं खुश्मों में महकता हूं
सिन्ने में कोई हलचल
होती है न रुकती है
कोई जाने न जाने क्यों तनहाई तरसती है
कोई जाने न जाने क्यों ये तनहाई तरसती है