कि तेरी मंगला काली भद्रकाली का पालने दुर्गाक्षमा शिवाधात्रि स्वास्वदानमों स्तुते मां का इश्वर्ण
किया है और आज भद्रकाली मैं जो मूर्ति दिए उस प्रटी है और आज काली का मैं प्रकट हो गई है वह लिखाली का माता की
दिए है और कखिक द्वारा उस टोकन का सट टार का मस्तद कांटिक बख्ती की � transformation उन्हें रख्षा कर दी
सुरुंठल घ्र भगवत्ति क्योंकि उस पुत्रों जाये तो कुछ दबिंग को माता नव था
पुत्र कुछ हो सकता है पर माता कभी कुम्माता नहीं हो सकती कि आज शर्णा गतदिन आर्थ परित्रायन परायने
सरवज्यार्थे हरेदेवी नारायणे नमस्तुते थे आज मां को शास्ठांग दंडवत किया धन्य मां भगवती जो तुमने
की रक्षा करी है जाओ मैं आशीर देती हूं कि तुम अचल हो जाओ तुम्हें भक्ति प्रदान होती है
कि जड़भरती महाराज मां को प्रणाम करके चल दिए हैं और चल रहे थे परमहंस है वह तो चल रहे हैं और
चलते-चलते एक राजा रहुगुण सोविर देश के बहुत कारवाहकों पर पाल की पर वेट करा रहा है एक कारवाहक
मैं बीमार पड़ गया ढूंढते हुए आए कोई और तो नहीं मिली हट्टे-कट्टे मिल गया जड़भरती महाराज
चलो जड़भरती महाराज मना तो किसी से करते नहीं और पहुंचे हैं और कारवाहकों के साथ ढोली को उठाने लगे
हैं और चलने लगे हैं और चलते-चलते अब वह जड़भरती महाराज ने क्या देखा है कि एक छीटी दिखाई दी
है और जो
दिखाई दी क्योंकि संत तो जो है किसी जीव को भी कष्ट नहीं देना चाहते हैं और अब इतनी जोड़दार चलाएं लगाई है
कि पाल की डोली है और राजा के सिर्फ लगी है अरे कारवाहकों तुम्हें चलना नहीं आता है महाराज हम तो
अच्छे से चल रही है पर अभी जोन्या नयाया यह चलने नहीं आता है कि अब तो ब्यंतर करने लगे ए मां अरे
अट्ठे-अट्ठे हो इतना बाद आते हो फिर भी तुम्हें चलना नहीं आता है कि अगर अच्छे से नहीं चलोगे तो मैं तुम्हें
नहीं कर दूंगा कि इस खड़क से मस्तक काट दूंगा कि जी महाराज अब फिर रत करभाग चलने लगे और अब की बार
चीटा दिखाई दिया और जो दिखाई दिया है जणबृति महाराज ने जोर से चलांग लगाई है अब तो सारी की सारी
हमारी पाल की जमीन पर गिरपड़ी है कि राजा रावगुण इतने क्रोधित हो गए अरे दुष्ट अब तू बच नहीं पाएगा
खड़क निकाली है कि इतना अट्टा कट्टा होकर चलता चलने नहीं आता है कि अब तू बद के योग है जड़ भरती
कर्च महाराज ने कहा मैं जानता हूं आज नहीं तो कल मुझे मरना आ या झाल नैन अम्सचिंदन्त शस्टरावणी नेनम द हिति
पाव का अरे शरीर ना आश्वर आज नहीं तो कलिसंत छोड़ना है पर मेरी जो आत्मा है जरम है इस आत्मा को ना
और सस्त काट सकता है ना अग्नी जला सकती ना चलू से गिला कर सकता है और महाराजी यह बताइए मुझे मृत्यु
की कोई चिंता नहीं आप कहां जा रहे हो का मैं गुरु के पास जा रहा हूं गुरु दिक्षा ले दे तो राजन तुम्हें
चोटा है हर जीम में फर्मात्वाहार निवाहस है भवाबक शर्मा समान और प्रेम ते प्रकट होई में अरेんだ
में और तुम राज चार्म को कश्ट देकर गुरु से मिलने जा रहे हो अरे गुरु कहा मंदिर में तो नंगे पेर जाने चाहिए
गुरु मिलन को चालिए तजमाया अभिमान जो जो पग आगे धरे खोटी आगे समान
अरे गुरु के हाँ मंदिर में तो नंगे पेर जाना चाहिए और जो नंगे पेर जाता है उसे एक करोड़ यक्की का फल मिलता है
अब तो राजा रहुगण समझ गए मैं तो इसे साधरण समझ रहा था यह परमंच से देखने के लिए सुंदर आज अडबराजी
मुझे छमा कीजिए कि सुंदर उपदेश दिया राजन इस संसार में केवल और केवल परमात्माई शास्वत सत्य परमात्मा के
वगर पत्ता भी नहीं आता है कि तुम तो भगवत श्मण करो और गुरु मंत्र दिया है ओम नमो भगवते वाशु देवाय और
वो राजा रुप रूप रून्ड को सचन गुणा लिया अरे मैं तो गुरु ढूंढने जा रहा था सद्व tuv पास आ गया
कभी-कभी प्यासा व्यक्ति कुए के पास जाता है और कभी-कभी कुआ चल कर प्यासे के पास जाता है
तो सद्गुरु बने हैं कृपा हुई तो ऐसे जड़बर्जी महाराज जिन्होंने जीवन में केवल और केवल भक्ति की
निष्काम भक्ति और भक्ति ऐसी हो जिसमें कोई स्वार्थ ना हो निश्वार्थ भाव से कि