लाजी महमेशाफी मडे आले ते के ला
नभी पारती नात लिखते है अब्दल्वाद लुहार
जिनात की खिदमत पेश करते है
हां भी वो कीमे करते है
जद वो इश्ग पुदरत नूपव ता सताया वो मक्गेरी बस्ती का प्यासा जाया
हां
अभी आदे बच्चे अदाया नहीं गईया जिनको चान गाई हली बाबैरीया
रो रो के कहनती है रभा
धरीमा तरी चोली पेणाए तुपरी अपीमा
ले मुहम्मत ले जा ख़दाना ले मुहम्मत ले जा
ख़दाना ते पक्षिष्टा तेनू अइ मिले आप आखाना
भालीं बादे कारेया भी पौलेश रह पांदे
पुंप चादे फुत्रे मुखद बरिज़ादान दे
कोई खिली आया ते बोले न जाले
मद न सुने आजा शेरा आवाजा इनज कथे हो गये न रेया अंधाला
आजा शेरा आवाजा इनज कथे हो गये न रेया अंधाला
शोहर की ले जियारत मैं करता
ओ बक्री दे आया फुछ हो गयी हलीमा
एक जंगल दे कर जैसा लामी ओ मुहम्मद न हुंदे न संसार हुंदा
न उण्छे न कलिया न गुलवार हुंदा न आजम न हुदा न ईसा न मुसा
न
शामा दे पहले असीर थे आप न बीवार हुंदा
न
शमशेर सार दे देया उठे तडबे ये पाका दे मननो न इनकार हुंदा
मुहम्मद की जीती शबीले गुलामी विवेशेर जंगल दे कर जैसा लामी
बड़ो कलमा सारे केंदे मुअल्लम खलला हो अलाहे बसल्लम
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