पढ़ा नहीं कैसे शुरूप करूँ पर मुझे उमीद है तुम ठीक हो।
कभी-कभी मुझे लगता है तुम बहुत अकेले हो और रहो भी क्यों ना।
नया शेहर है,
नए लोग हैं लेकिन मैं कोशिश करूँगी तुम्हें घर की ज़ाधा याद ना आये।
कभी तो मुझे लगता है तुम मेरा ब्रहम हो,
क्या मैं कोई खाब देख रही हूँ
और अगर ये खाब है तो मैं चाहती हूँ ये हकीकत हो जाये।
मुझे याद है जब मैंने पहली दफा तुम्हारी आखे देखी थी।
मैं ये तो नहीं कहूँगी कि मैंने वही आत्मसमर्पन कर लिया था।
पर देखकर लगा जैसे एरूहा रहा दिया गल्लाने।
हाँ तो कहा थी मैं।
तुम्हारे वो दाद,
तुम्हारी मुश्कुराहट और वो छुपकर तुम्हारा मुझे देखना।
आज जब तुमने मुझे गले लगाया,
मेरा दल बहुत जोय से धडडख रहा था।
लेकिन मन शान था।
लोगों से सुना है जन्नत के बारे और ये सच में मौजूद है,
तो मेरे लिए तुम वो जन्नत हूँ।
फिर मेरा तुम्हारे पीछे जफना करूँ भी क्या,
मुझे शरम बहुत आती है।
ऐसा लगा जैसे मेरी दुनिया बस ठहर गई और मैं
जाहती भी नहीं वो चले। और चले तो तुम्हारे साथ।
ये सब कितनी अजीब चीज है ना और कितनी खुपसूरत है।
अब मुझे डर लगता है या मानो यकीन है
तुम चले जाओगे। तुम मुझे बागी लगते हूँ।
मुझे मेरी किस्मत पर भरोसा नहीं,
मैं किसी लाइक भी नहीं। अकसर ये लोग मुझे कहें देते हैं।
मुझे तुम से कुछ फैसा नहीं जैसे पहले कभी किसी से हुआ करता था।
ये अलग सुरूर है। मैं नश्य में हूँ।
अब मुझे नहीं चाहता कैसे शुरू करो।
तुम ठीक हो।
अपना ख्याल रख लिया करो। उलज्जे हुए से तुम।
तुम्हारे कमरे को सजाने की तमन्ना है। और मुझे पता
है तुम्हारे कमरे में किताबों के सिवा कुछ नहीं है।
लेकिन लिदर,
तुम कुछ पढ़ कर सुनाओ ना। बहुत बिख्रेवे रहते हो तुम। क्यूं?
क्या दर्थ है?
क्यों खुस से जूट बोलते हो?
मैं जानती हूँ तुम्हें लगाव पसंद नहीं पर,
खुस से जबर्दस्ती क्यूं?
तुम वो क्यूं नहीं कहते जो तुम्हें पसंद हो?
तुम्हें सब समझा जारा है न?
भगत सिंगे राही तुम्हें?
क्यूं कैदी हो खुद के विचारों के भी?
या तुम्हारे जो बीटार चल रहा है?
तुम मेरा पूरा आस्मान हो?
तुम्हें देख भी लूतो राहत होती है?
कितना जीब है न?
तुम मेरा पूरा आस्मान हो?
लेकिन मैं वो पक्षी हूँ जो उड़ नहीं सकती?
तुम ना बारिश हो और मुझे जुनून है तुम्हारे साथ भीजना है तुम्हारे साथ
वादियों में जाना चाहती हूँ पहार और तुम तुम्हारे साथ बनारस के हर घाट
बैटना चाहती हूँ तुम्हारे साथ हर चड़ता ढलता सूरज देखना चाहती हूँ बस चलन
तुम्हारी आवास हसी तुम्हारे कारगो पे वो पेन के निशान
मुझे सब पसंद है
मैं अब तुमसे बाहर नहीं निकल सकती
और मुझे इस बात का कोई गम नहीं तुम जहां भी जाओ
मैं खुश हूँ मेरे मन में इसका कोई शोर नहीं जब ठक चाओ
तब लग़ाना
साथ बैठेंगे चाई पींगे आस्मान देखेंगे
तुम चान देखना मैं तुम्हें देखूँगी