स्री हन्मान जी की उत्पत्ती के क्या कारण थे और क्या उद्धिश्य थे?
आएए,
सुनियें।
ओम् स्री हन्मते नम्ह
जब जब इस संसार में धर्म की हानी होती है,
आधर्म की बढ़ोत्री होती है,
तब तब उस परमपिता परमात्मा की दिव्य शक्तियों का प्रादुरभाओ
इस रिशी मुनियों की पवित्र भूमी पर सदा होता रहा है।
सत्यपत्नगरी के राजः केश्री और पट्राणी अंजणा के कोई संतान नहीं थी।
इसलिए अंजणा ने अपनी पती की आज्या को सिरोधारी करके
गंधमादन परवत पर जा करके भगवान शिव की कठोर तपस्या के बात।
बहुत दिनों की गोर तपस्या के बात
लोक कल्यान कारी भगवान स्री भूतनात जी प्रगथ हुए और
उन्होंने अंजणा से वरदान मांगने को कहा। अंजणा बोली ए
वगवान हमें आप जैसा ही बली तथा तेजश्वी पुत्र चाहिए।
भगवान शंकर ने कहा देवी मैं ही पुत्र रूप में तुम्हारे गर्भ
से उत्मन होंगा। ऐसा वरदान देकर सदाशिव अंतरध्यान हो गये।
चलंदर जैसे बल्वान राक्षस का संघार करने के लिए भगवान
शदाशिव को ये जरूरी हो गया कि पवंदेव की शक्ती भी शात हो।
क्योंकि वे राक्षस बहुती तेज गती से अक्रमन करता था।
भगवान शंकर के अन्रोत पर पवंदेव ने अपना पूरा बल वेग
भगवान शिव के साथ समाहित कर दिया। उस वेग के सहयोग से ही
भगवान शदाशिव द्वारा जैलंदर मारा गया।
उस दुरात्मन का संगार करके
भगवान शिव ने पवंदेव को उनकी शक्ती वेग वापिस लोटा दिया। और उनसे
वर्दान माँगने को कहा। पवंदेव ने भगवान शंकर से उनकी अविचल भक्ती माँगी।
भगवान शिव ने प्रती उत्तर में कहा
इसके बदले मैं तुम्हारा पुत्र होकर विश्व में अपनी कीर्ती फैलाऊंगा।
लंका धीपती राजा रावण के अत्याचार से समस्त विश्व घबरा गया था।
देवी देवता भी उसकी शक्ती का लोहा मानते थे।
रावण और कुम्बकरण भगवान शंकर के ही भक्त थे।
रावण ने जो शिव जी को अपना सीस काट कर चड़ाया था
और ब्रह्मा जी से नारो और वानर के अतलिक्त किसी
से भी ना मरने का वर्दान प्राप्त कर लिया था।
तभी तो गोश्वामी तुलसी दास जी ने भी कहा है
हम काहू के मरही न मारे वानर मनुज जाती दो उठारे।
इस वात को जानकर समस्त देवताओं ने भगवान संकर
की गोर तपस्या के। तब भगवान शिव ने उन्हें बताया
कि रावन और कुम्भकरण दोनों उनके ही गण ही तो थे। अतय उन्हें
पुने वापिस बुलाने के लिए शिव श्वें आकूल थे। इसके अत्रिक्त
भगवान शिव ने बताया
कि मैं बंदर का अभिमान शुन्य रूप धारण करूँगा तथा
स्री राम का अंचर बनकर प्रत्वी पर अवतरित हूँगा।
कोटुकी नगरी में नारद द्वारा
स्राप पाचुकने पर भगवान विश्णू सदाही चिंतित रहते थे।
शेषासन पर बैठे बैठे विश्णू ने सोचा कि सिव कोभी हमारे साथ
चलना चाहिए नहीं तो रावन को पराजित करना सहेच कारिय नहीं है।
भगवान विश्णू ने
शहस्त्र दल वाले रक्त कमलों को लेकर भगवान
संकर की आराधना करना प्रारंब कर दिया।
भगवान विश्णू ने प्रभो आप हमारे आराध्य देव हैं
आपी के द्वारा दिया गया मोगस्त्र चक्र सुधर्शन ही हमारा
रक्षक है अब आपको भी हमारे साथ ही प्रत्वी पर अवतरित होना है।
भगवान शिव ने बताया की प्रभो मैं तो सदा ही आपकी सेवा
के लिए तैयार हूँ मैंने भी देवी अञजणा को वरदान दिया
है की उनी के गर्भ श्रिपुत्र रूप में मैं उत्पन हूँगा।
वैसे तो रावन हमारा भकती हैं,
किंटु वैभो के रंग में रंग कर वे भले बुरे का ज्यान भूल चुका है।
भकतों,
जैसा कि मैंने सुरू में आपको कहा
कि भगवान हन्मान जी की उत्पत्ती के क्या कारण थे,
ये सारी की सारी उपरोक्त प्रमुक कारण थे,
जिनकी वज़े से हन्मान जी को इसे मानो चोले को
धारन करके धर्म की इस्थापना के लिए आना पड़ा।