जयती ते धिकं जन्मना ब्रजा
सर्यत इन्धिरा सस्वदत्रहि
सर्यत पीछता भीच्चतावताव
परिदेपास्वस्वां बिच्चितुवे
सर्दुबासे
ताभुजाति सर्वद परिदो धराव पीछादिका
शुरतनात ते
अशुर्वदासिका
अरधनी पोर मेखिंदा
वीस जला पया
व्याल
रच्चिस्पाव
वरसु पावताव पेत्वन्भाव
वीस भयात्मदा
त्रीस्तु प्रया
त्रीस्वते वयं रच्चितामुभुदि
त्रातलुभुपितानंडनोभवाखिलंतेहिनावात्रात्रे
विखन सातिको
वीस गुत्तै
सत्वुदेहिवा सात्वतोर्पुले
विखन सातिको
वीस गुत्तै सत्वुदेहिवा सात्रुपुले
विखन सातिको
वीस गुत्तै सत्वुदेहिवा सात्रुपुले
विखन सातिको वीस गुत्तै सत्वुदेहिवा सात्रुपुले
विराया सत्सदापुले जैस्तदापुले
सत्सदापुले सत्सदापुले
जत्ते सुजात चरडां बुर्हुमस्तनेसु
भीतासने प्रियदधी महिकर्कसेसु
तेनाटबीत मतसितत ब्यत्तेन किन्सुत कूरुपार्दिभ्रमती धीरवदायुशाम।
वगवान को प्राप्त करने के लिए गोपीयों ने घीत गाया पहली गोपी कह रही है।
ए गोविंद जयतिते धिकम जन्मनः ब्रजा।
आपके
जन्म से
ये ब्रज बैकुंथ से भी जादा सुसोभित हो रही है।
श्रयत इंदिरा सस्वदत्र ही। इंदिरा लक्ष्मी सास्वत
आकर के जैसे ब्रज मंडल में अपना बैसैरा बना लिया हो।
हम लोग कितने सवभाग्यसाली हैं जो अस ब्रज मंडल में अवतार लेकर आये हैं
और आपका दर्शन कर रहे हैं जो बैकुंथ से भी जादा सुसोभित हो रही है।
और एक आप हो कि हमारा परित्याक करके चले गए हो
जहां भी हो द्रिश्चताम दिख जाओ गोविंद दिख जाओ।
दूसरी गोपी कहती है
हम आपकी असुल्क दासीका हैं
आपके प्रेम के बदले में कुछ चाहती नहीं हैं।
जब गाय चराने जाते थे न तो एक-एक मिनट तुट्री युगा आये थे।
अजारों बर्स के समान बितीत होता था गोविंद।
आज तुम इतनी देर से गायब हो।
तुम लोटकर चले आओ क्योंकि तुमको पाप लगेगा मेरे बध का।
बध का पाप लगेगा। और भगवान ने कहा मैंने तुम्हारा कौन सा बध किया है।
कौन सा बांड चलाया,
कौन सा तीर चलाया,
कौन सी बरच्ची चलाई है।
गोपीयों ने कहा केवल बांड से ही प्राण नहीं जाते।
तुमने हमारे प्राण नेत्रों से ले दिया है।
नेह किम बधा, मेरे नेह से,
अपने कटीली नेत्रों से बांड चला कर और मेरा बध कर दिया है।
अपने कटीले नेत्रों से मेरे बध करने वाले गोविंद जहां भी हो,
आ करके प्रगट हो जाओ, दृश्यतां दिख जाओ।
तीसरी गोपी कहती है
कि जब अपने प्रेम रूपी बिरह अगनी में जला कर मारना था,
तो विस जलापयाद,
ब्याल राक्षसाद,
बरसमारुताद,
बैद्युतांजलाद,
अजगर से रक्षा क्यों किया,
आग से रक्षा क्यों किया,
इंद्र के कोप से रक्षा क्यों किय
ब्रह्मा की द्वारा बनाई होई स्रिष्टी में जितने जीवुधारी हैं,
उन सब की अंतरात्मा हो गोबिंद,
जहां भी आओ, रखो, मेरे मस्तक पर अपने हाथ।
किसीने कहा कि क्यों आये,
तुमारे मन में वासना आ गई,
भगवान को छोड़कर तुम अपने आप को देखने लगी,
अपनी सुन्दर्ता को देखने लगी,
तुमारे अंदर वासना आ गई,
और जहां वासना आ जाये,
वहां गोबिंद अपना पाउ नहीं रखते।
गोपीयों ने कहा, फणफणार पितं तव पदां भुजं।
क्या कालिया नाग से भी ज़्यादा विस हमारे हिर्दे में भरा है?
जब कालिया के फणपर आप अपने पैर रख सकते हो,
तो मेरे हिर्दें पर अपने पैर को विराजमान नहीं कर सकते,
गोबिंद?
बगवान ने कहा,
पैर से मार मार के मैंने उसके विस का बमन करा दिया।
तो गोपीयों ने कहा,
मेरे हिर्दें का भी विस बमन हो जायेगा,
एक बार अपने पादार बिंद हमारे बक्ष पर आसीन करो नागोबिंद।
दिश्चित रूप से मेरे भी मेरी भी वासना मिठ जायेगी आपके
पादार बिंद पड़ जायेंगे तो जहां भी हो आकर धर्सन कर दो।
बगवान ने कहा एक काम करो,
जब कोई किसी को ज़्यादा प्रेम करता है
उसके बिना नहीं रह पाता तो क्या करता है?
मर जाता है।
यही करता है ना?
भी बहुत ज़्यादा प्रेम हो उसके बिना कोई नहीं रह पावे तो मर जाये,
आत्मथ्या कर ले
तो तुम क्यों नहीं मर जाती हो मेरे से इतना प्रेम करती हो तो?
भोपीयों ने कहा वो भी कर के देख लिया लेकिन मर नहीं पाती हो।
क्यों नहीं मर पाती हो?
क्योंकि तव कथा मृतम्
तफ्त जीवनं
कभी भी जीतम्
कल्मशत्म
यही बात हनुमान जी महराज से भगवान राम ने पूछा था
क्यों हनुमान?
किसोरी मुझे इतना प्रेम करती है
लंका में वो जीवित नहीं होगी उसने अपना प्राण दे दिया होगा
हमारे बिना किसोरी जीवित नहीं रह सकती है
हनुमान जी ने कहा प्रभु बिलकुल ठीक कह रहे हो
किसोरी जी अपना प्राण तो देना चाहती है लेकिन दें कैसे
प्राण बसेन निज चरणन में जम आवत हैं पर पावत नोखु
अइसे प्रेमी तो केवल एक थे महराज दसरत
राम जी गए तो उनके साथ साथ अपने प्राणों का विपर इत्याग कर दिया
सत्य प्रेम किसी का है महराज दसरत का है
जैसे ही राम ऐउद्या से निकल कर गए हैं लोट करके महराज सुमंतर आये हैं
और सुमंतर ने कहा राम बन चले गए तुरंत उनके नेत्रों की
जोती चली गई मुह सूख गया अधर फड़ाने लगे जमीन पर गिर गये
महराज नाथ पावम पस्यामी कवसले पानिस प्रसग्रहाम में
मेरा अस्पर्स करो मेरी द्रिश्टी राम के साथ से चली गई मु�
राम राम कही राम कही
राम राम कही राम
तन परिहर रभुबर बिरह राऊ गये सुर्धा
महराज राम के भियोग में अपने प्रानों का परिथ्याग कर दिया
गोपीया कहती हम भी करना जो चाहते लेकिन क्या करें
तुम्हारी याद इतनी आती है कि प्रान चाहें भी तो निकल नहीं पाते
बहुत कोसिस करती हूं
लेकिन तव कथाम्रतं तप्त जीवनं
कभिभिरीडितं कलमसापहं
अमरित की भूद टपक्ती है जीवन में कथा
वनकर और तुम्हारी कथा मारिकाग्रहम है
वो मरने नहीं देती ना जीने देती है बस तुम्हारी याद चोबिस घंटा बनी रहती
है
बहुत प्रयास करके भी तुम्हारी याद भूलती नहीं और गोपी कह रही है
तुम्हारी याद आती है बताओ
क्या करें मोहन
तुम्हारी
याद आती है बताओ
क्या करें मोहन
तुम्हारी
याद आती है
बताओ
क्या करें मोहन
तुम्हारी
याद आती है बताओ
क्या करें मोहन
तुम्हारी याद आती है बताओ
क्या करें मोहन
ताली बजाते हुए भगवान की याद करते रहें
सुबार साम
आती है
रात भर को सताती है
सुबार साम आती है रात भर को सताती है
चैन हमको
चैन हमको नहीं आता बताओ
क्या करें मोहन
तुम्हारी याद आती है
बताओ
क्या करें मोहन
कडपना क्या ये मत पूछो
आले दिल पहनही सकता
कडपना क्या ये मत पूछो आले दिल पहनही सकता
समझ ले
समझ ले
समझ ले
पाल दूमेलाभ करो
क्या करें मोहन तुम्हारी
याद
आती है बताओ क्या करें मोहन
बताओ क्या करें मोहन
चरू जब हो
न चलू ने जे रुकू जब ये न रुकू न खुँ
चरू जब हो न चलू ने जे रुकू जब ये न
रुकू न खुँ
मिलो
आले दिल
पहनही सकता
कडपना क्या करें मोहन
तुम्हारी
याद आती है
बताओ
क्या करें मोहन
क्या करें मोहन बताओ
क्या करें मोहन
इतर राव्य विसमर्णम
क्लिंग नाम का मंत्र
बंसी में फूंक कर मुझे बुलाया
छोड कर गोविंद चले गए हो हम सब गोपियां इसी यमुना के किनारे बैठ कर
अपना प्रान दे देगे
क्या गल्ती बन गई जो मुझे छोड कर चले गए
एक गोपी कहती है
कि भक्तों ने भगवान को अपने सर पे चड़ा लिया है
इतनी अस्तुति इनकी,
इतनी पूजा,
इतनी आराधना इनकी हो गई है
कि यह भक्तों के आशु इनको देखे नहीं जाते हैं
अगाधे चड़ गए हैं यह
तौ कथा मृतम् तप्त जीवनम् कविविरीडितम्
कल्मसापहम् स्रमणमंगलम् स्रीमदाततम्
स्रीमद हो गया है इनको
मद में मदान्द हो गये हैं क्यों क्योंकि इनकी पूजा इतनी हो गयी
हम लोग इतने दिन से बिना खाये पीए भूंखे नंगे
पैर भटक रही हैं प्राण निकलने को है आशु सूख गये
लगिन अभी तक आकर के प्रगट नहीं हो रहे हैं इसका मतलब है
स्रीधरस्वामी कहते स्रीमदाततम् इनको स्रीमद हो गया है
भगवान के भक्त भगवान से जगडा भी करते हैं
जगडा आप उसी से कर सकते हो जिससे आपका प्रेम हो गया
जिससे प्रेम नहीं होगा उसे जगडा क्या करोगे
एक आदमी
हन्वान जी की पूजा करता था उसके साधी नहीं हो रही
थी तो धन्दी में हन्वान जी को रजाई ही नहीं दे रहा
था वोडने के लिए
कहें कि जब विवा नहीं करा तो रजाई क्यों
देगे वोडने के लिए कराओ विवा सुबरिय साम घंटी हिलाता
हूँ इतना भी नहीं कर सकते हो
कोपियां कहती स्रीमदात
तं आपको स्रीमद हो गया
कितने स्लोक कितने कस्तोत्रस़बनाए गये
इतने
शलोक बनाए गय,
इतना बंदन किया गया,
इतना अरचन किया गया,
कि अब भक्तों के आशु तुमको दिखते नहीं हैं।
तुम इतने कुटिल हिरदें के कैसे हो सकते हो?
मुझे तो संका लगता है कि तुम यशोदानन्दन
भी नहीं हो और देवकी नन्दन भी नहीं हो।
क्योंकि दोनों तो इतने कुटिल नहीं हैं।
दोनों तो परम दयालू हैं, परम दीन हैं।
और तुम कैसे हो?
जो हमारे आशु तुमको दिखाई नहीं पड़ते हैं।
गोपिया रो भी रही हैं तो सुर में रो रही हैं।
रोने का भी अपना एक सुर होता है। माताये रोती हैं तो देखो कभी।
अपने सुर में ही रोती हैं। हर काम का सुर होता
है। गाने का सुर तो रोने का भी सुर होता है।
रो रो के पूरी कहानी बता देती हैं। बिदाई होती है तो पूरी कैसे जाओगी?
तो कौन खिलाएगा, कौन पानी देगा?
एक सुर में पूरा है।
गोपियां भी यहां सुर में रो रही हैं।
रुरुदुःसुस्वरम्राजन् कृष्णदर्सनलालसा।
बस यह है कि यहां संसार के लिए लोग रोते हैं
और गोपियां भगवान के लिए रो रही हैं।
बहुत देर तक भगवान भक्तों के आशु देख नहीं पाते हैं।
सारी गोपियां रोती रोती जब भिवल हो गईं,
बिहोसी होने लगीं,
जल का परित्याक कर दिया,
अब ऐसा लगा कि इन सारे गोपियों के प्राणांत हो जाएंगे।
भगवान भक्तों से बहुत दूर तक अपने आपको नहीं रख पाए।
उन गोपियों के मद्ध में पीला पितांबर पहने हुए साक्षात कामदेव
के मन को मथने वाले परमात्मा कृष्ण का प्राकट्य हो गया।
बलो बिंदावन भिहारी लाले की जैव।
ऐसा लगा कि जैसे गोपियों के सरीर में पुनह प्राण वापस आ गये।
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