भीरे साथ्यों की सेवा में एक रोमेंटिक रागनी
बताया कमिले एक किसी गाउ में
एक बागड़ो लुहारी आ जाती है
अपना सामान वेजदी फिर रही हैं महरबानों
पंडिति नरेश कोशिक जी खेड़ी वालों में
क्या परसंसा उसके रूप की कर दी
क्या बताया
हंसा बहती रागनी के मादम से लेकर के आवें हरेंदर नागर हस्तनाफूर
हो आई गाउ में एक लुहारी जोपन की भरी पिठारी
हड़ी गाल में सोर मचारी रचिम्टा फुकनी लेलो
हो सिपी छलनी लेलो
आई गाउ में एक लुहारी जोपन की भरी पिठारी
हो सोर मचारी रचिम्टा फुकनी लेलो हो सिपी छलनी लेलो
हो रचिम्टा फुकनी लेलो हो सिपी छलनी लेलो
बोरला मात्थे जमके
चंदा सादमके
चले मोरनी बरगी पावधरी थम थमके
उसके छेरे का रंगलाल घणा कर या जमाल गयी दिल मेरे पत्या बबाल
रचिम्टा फुकनी लेलो हो सिपी छलनी लेलो
गुलाबी ओट रसीले नैन ते बड़े नसीले
लग या बोतल रम की पैग मैं भर भर पीले
फुलो की लड़ी कैसी राम ने भडी वाकी उमर सौल भी चड़ी
खेरे छिम्टा फुकनी लेलो
हो सिपी छलनी लेलो
ओ बाड़ नसुमार कटारी
वा तिर्छी नजर लखारी
खड़ा मैं उसे निहारू
अनि वो लागे प्यारी
मैं तो हो गया रे गुर्मान जब से देखी उस किसार पूरे कैसे हो अर्मान
रे चिम्टा फुकनी लेलो हो सिपी छलनी लेलो
ओ चिम्टा फुकनी लेलो हो सिपी छलनी लेलो
ओ उस वह माता की वा थी चत्राई
घड़केवा रे सुत्री
बीर बनाई
रे चिम्टा फुकनी लेलो हो सिपी छलनी लेलो
ओ चिम्टा फुकनी लेलो हो सिपी छलनी लेलो
आई गाऊं में एक लुहारी योबन की वरी पितारी
हड़ी गाऊं में सोर मचारी रे चिम्टा फुकनी लेलो
हो सिपी छलनी लेलो औई रे चिम्टा फुकनी लेलो
हो सिपी छलनी लेलो औई रे चिम्टा फुकनी लेलो
हो सिपी छलनी लेलो